उत्तराखंड चमोली के वसुंधरा ताल पर लगेगा अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम, ग्लेशियर झीलों के खतरों पर रहेगी पैनी नजर,,,

देहरादून। उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों से जुड़े संभावित खतरों की निगरानी और समय रहते बचाव के लिए तकनीक का दायरा तेजी से बढ़ाया जा रहा है। इसी कड़ी में केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की द्वारा चमोली जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र में स्थित वसुंधरा ताल में एक अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित किया जा रहा है, जिसकी सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। इससे पहले सीबीआरआई की इस स्वदेशी तकनीक को मनाली में लगाया गया था, जहां से पिछले एक साल से निरंतर डेटा प्राप्त हो रहा है।
🟢 सिस्टम की मुख्य विशेषताएं और कार्यप्रणाली
- विशेष टॉवर और सेंसर: झील क्षेत्र में एक विशेष टॉवर स्थापित किया जाएगा, जिसमें कई आधुनिक सेंसर लगाए गए हैं।
- निरंतर निगरानी: ये सेंसर बारिश, बर्फबारी, झील के आकार, जलस्तर और पानी के बहाव में होने वाले बदलावों पर लगातार नजर रखेंगे।
- रीयल-टाइम डेटा ट्रांसफर: झील में किसी भी असामान्य गतिविधि (जैसे हिमखंड का गिरना, जलस्तर बढ़ना या प्राकृतिक बांध में दरार) होने पर सेंसर मात्र एक से दो मिनट के भीतर कंट्रोल रूम को सूचना भेज देंगे।
- सैटेलाइट और कैमरे की कनेक्टिविटी: सेंसर सैटेलाइट से जुड़े होंगे और घटनाक्रम की पुष्टि के लिए विशेष कैमरे भी लगाए गए हैं।
🔴 आपदा से बचाव और एक घंटे पहले चेतावनी
वैज्ञानिकों का मुख्य लक्ष्य इस प्रणाली के जरिए किसी भी संभावित खतरे की स्थिति में लगभग एक घंटे पहले अलर्ट जारी करना है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि वसुंधरा ताल कभी टूटता है, तो पानी और मलबा मात्र आठ से दस मिनट में करीब 20 किलोमीटर नीचे तक पहुंच सकता है। ऐसे में यह अर्ली वार्निंग सिस्टम संवेदनशील क्षेत्रों में समय रहते चेतावनी जारी कर जान-माल के भारी नुकसान को रोकने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस स्वदेशी तकनीक के डिजाइन और विकास में वैज्ञानिक चंद्रभान पटेल, कांति एल. सोलंकी और डॉ. डी.पी. कानूनगो की प्रमुख भूमिका रही है।
