उत्तराखंड भालूगाड़ मॉडल, उत्तराखंड का वह सामुदायिक इको-टूरिज्म प्रयोग, जो प्रकृति संरक्षण को दे रहा है आर्थिक समृद्धि का आधार,,,,

हल्द्वानी: उत्तराखंड के नैनीताल जिले के भालूगाड़ जलप्रपात और वहाँ की वन पंचायतों ने प्रकृति संरक्षण और हरित अर्थव्यवस्था का एक अनूठा और व्यावहारिक मॉडल पेश किया है। धारी क्षेत्र के घने बाँज-बुरांश वनों के बीच स्थित भालूगाड़ आज एक लोकप्रिय सामुदायिक इको-टूरिज्म स्थल के रूप में उभरा है, जहाँ पर्यावरण संरक्षण और आजीविका साथ-साथ आगे बढ़ रहे हैं। यह मॉडल साबित करता है कि यदि वन, जल और पर्यटन को एकीकृत किया जाए, तो यह जलवायु परिवर्तन और जल संकट जैसी चुनौतियों का प्रभावी उत्तर बन सकता है।
🟢 सामुदायिक पहल से बदली तस्वीर
वर्ष 2014-15 में पर्यटन को उद्योग का दर्जा मिलने के बाद भालूगाड़ क्षेत्र में पर्यटकों की संख्या तेजी से बढ़ी, जिससे प्लास्टिक कचरा और वनों पर दबाव जैसी समस्याएँ सामने आईं। इसके समाधान के लिए 2017 में चौखुटा, गजार और बुरांसी वन पंचायतों के स्थानीय लोगों और महिलाओं ने आगे आकर पर्यटकों के नियंत्रण और संरक्षण का बीड़ा उठाया। 18 जुलाई 2018 को “भालूगाड़ जलप्रपात (छिण) सहकारी समिति” का विधिवत गठन किया गया। आज 32 सदस्यों वाली यह समिति पूरी पारदर्शिता और अनुशासन के साथ इस क्षेत्र का संचालन कर रही है।
🟢 पारदर्शी वित्तीय मॉडल और पुनर्निवेश
समिति ने पर्यटन को संरक्षण का माध्यम बनाया है। जहाँ 2018 में 3,500 पर्यटकों से मात्र 35,000 रुपये की आय हुई थी, वहीं बेहतर प्रबंधन के चलते 2025 में पर्यटकों की संख्या बढ़कर लगभग एक लाख और वार्षिक आय लगभग 50 लाख रुपये तक पहुँच गई। स्थानीय नागरिकों से कोई प्रवेश शुल्क नहीं लिया जाता है। इस आय का वितरण और उपयोग अत्यंत पारदर्शी तरीके से किया जाता है:
- 40% हिस्सा: जिला पर्यटन विकास परिषद को जाता है।
- 15% हिस्सा: संबंधित वन पंचायतों को वृक्षारोपण, जल संरक्षण एवं स्थानीय विकास के लिए दिया जाता है।
- 45% हिस्सा: रखरखाव, सफाई, सुरक्षा, स्थानीय कर्मचारियों के मानदेय और अन्य सामुदायिक कार्यों पर खर्च होता है।
🟢 हरित अर्थव्यवस्था और भविष्य की दिशा
यह पहल ‘पेमेंट फॉर इकोसिस्टम सर्विस’ (पीईएस) की अवधारणा को जमीन पर उतारती है। हिमालयी क्षेत्र देश को जल, कार्बन और जैव विविधता जैसी अमूल्य सेवाएँ प्रदान करते हैं। भालूगाड़ का यह अनुभव दर्शाता है कि जब पर्यटन से प्राप्त आय का एक हिस्सा पुनः जंगलों और जलस्रोतों के संरक्षण में लगाया जाता है, तब पर्यावरण संरक्षण स्थानीय अर्थव्यवस्था की मजबूत आधारशिला बन जाता है। भारत के ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम और भारतीय कार्बन बाजार जैसी पहलों के दौर में, उत्तराखंड की वन पंचायतों और भालूगाड़ जैसा यह समुदाय-आधारित मॉडल अन्य पर्वतीय क्षेत्रों के लिए भी एक प्रेरणादायक मार्ग प्रशस्त करता है।
