“अज़ब – गजब” एस्सेल ग्रुप और ज़ी (Zee) के संस्थापक सुभाष चंद्रा पर ₹22,006 करोड़ के कर्ज का मात्र₹6.5 करोड़ में सेटलमेंट से भारतीय बैंकिंग व्यवस्था पर सवाल,,,,

🔴 22,006 करोड़ रुपये के दावों पर मात्र 6.5 करोड़ का भुगतान
राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) के एक हालिया फैसले ने देश की वित्तीय और दिवालियापन व्यवस्था पर बड़ी बहस छेड़ दी है। एस्सेल ग्रुप और ज़ी (Zee) के संस्थापक सुभाष चंद्रा से जुड़े व्यक्तिगत दिवाला मामले में, NCLT ने लगभग ₹22,006.57 करोड़ के भारी-भरकम स्वीकृत दावों के एवज में केवल ₹6.5 करोड़ की पुनर्भुगतान योजना (रीपेमेंट प्लान) को मंजूरी दे दी है। इस हिसाब से बैंकों और कर्जदाताओं को करीब 99.97% का भारी नुकसान (हेयरकट) उठाना पड़ा है।
🔴 पर्सनल गारंटी और ब्योरे का गणित

वित्तीय विशेषज्ञों और कानूनी दस्तावेजों के अनुसार, यह ₹22,006 करोड़ की राशि सीधे तौर पर सुभाष चंद्रा द्वारा लिया गया व्यक्तिगत कर्ज नहीं था, बल्कि यह एस्सेल समूह की विभिन्न कंपनियों द्वारा लिए गए उन ऋणों से जुड़ी थी जिनके लिए उन्होंने व्यक्तिगत गारंटर (Personal Guarantor) के रूप में हस्ताक्षर किए थे। दिवाला समाधान प्रक्रिया के तहत जब उनकी व्यक्तिगत संपत्ति का आकलन किया गया, तो यह पाया गया कि उनकी कुल व्यक्तिगत संपत्ति स्वीकृत दावों की तुलना में बेहद कम है, जिसके आधार पर इस न्यूनतम भुगतान योजना का प्रस्ताव रखा गया।
🔴 बैंकिंग संस्थानों का कड़ा विरोध और कानूनी टकराव इस प्रस्ताव को लेकर वित्तीय जगत में गहरी असहमति देखने को मिली। एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस (LIC Housing Finance) और एचडीएफसी बैंक (HDFC Bank) जैसे प्रमुख कर्जदाताओं ने इस सेटलमेंट का पुरजोर विरोध किया। आंकड़ों के मुताबिक, इस प्रक्रिया में कुछ बैंकों को उनके कुल दावों का मात्र 0.02% से 3% हिस्सा ही मिलने का प्रस्ताव था। विरोध करने वाले बैंकों का तर्क था कि हजारों करोड़ के बकाये के मुकाबले कुछ करोड़ का भुगतान पूरी तरह से अव्यावहारिक और अन्यायपूर्ण है। हालांकि, कुल ऋणदाताओं में से 80.81% के बहुमत का समर्थन इस योजना को प्राप्त था, जिसके आधार पर NCLT की तीसरी पीठ ने दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (IBC) की धारा 114 के तहत इसे मंजूरी दे दी। इस फैसले के खिलाफ अब कई बैंक नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में अपील करने की तैयारी कर रहे हैं।
🔴 आम नागरिक बनाम कॉरपोरेट व्यवस्था पर गहरी नाराजगी
इस तरह के मामलों ने आम जनता और छोटे कर्जदारों के मन में व्यवस्था के प्रति असंतोष पैदा कर दिया है। जहां एक तरफ आम आदमी होम लोन या क्रेडिट कार्ड के मामूली बकाये के लिए बैंकों और रिकवरी एजेंटों के सख्त रवैये, कानूनी नोटिस तथा मानसिक उत्पीड़न का शिकार होता है, वहीं दूसरी तरफ बड़े कॉरपोरेट और प्रमोटर्स से जुड़े हजारों करोड़ के ऋण मामलों में इस तरह के सेटलमेंट वित्तीय न्याय प्रणाली की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े करते हैं।
