उत्तराखंड सैन्य परंपरा और शिक्षा के गौरवशाली इतिहास को याद कर भावुक हुए ग्रामीण, नई पीढ़ी को सौंपी सांस्कृतिक विरासत,,,,,

बागेश्वर (कांडा): उत्तराखंड के पहाड़ों से हो रहे लगातार पलायन के बीच कांडा तहसील का टिटोली गांव उम्मीद और अपनी मिट्टी के प्रति अगाध प्रेम की एक नई कहानी लिख रहा है। रोजगार, व्यवसाय और शिक्षा के सिलसिले में देश के विभिन्न महानगरों में बस चुके इस गांव के लोग हर साल अपनी जन्मभूमि की ओर लौट रहे हैं। अपने गांव, संस्कृति और पूर्वजों से जुड़ाव का यह अनूठा दृश्य मंगलवार को तब देखने को मिला, जब टिटोली गांव ने अपना 134वां स्थापना दिवस पूरे उत्साह, श्रद्धा और गौरव के साथ मनाया।
🟢 पूर्वजों को तर्पण के साथ हुआ भावुक आगाज
स्थापना दिवस का यह आयोजन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम न रहकर, प्रवासियों के लिए अपनी जड़ों से जुड़ने का एक भावनात्मक पर्व बन गया। कार्यक्रम का शुभारंभ पूर्वजों को तर्पण तथा श्रद्धांजलि अर्पित कर किया गया। कुल पुरोहित दीप पांडे द्वारा पितरों का आह्वान किए जाने के बाद गांव में सुंदरकांड पाठ तथा सामूहिक प्रार्थना का आयोजन हुआ, जिसमें ग्रामीणों ने क्षेत्र, राज्य और राष्ट्र की समृद्धि के लिए मंगलकामना की।
🟢 नेपाल से टिटोली तक का 134 वर्षों का गौरवशाली सफर
गांव के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए बताया गया कि 24 जून 1894 को गांव के पूर्वजों ने इस भूमि को खरीदकर यहां स्थायी बसावट की नींव रखी थी। गांव के मूल पूर्वज नेपाल, जौलजीबी और पिथौरागढ़ के छाना बिलौरी क्षेत्र से होते हुए यहां पहुंचे थे। कर्नल बीएस रौतेला ने बताया कि पूर्वज स्वर्गीय भगवान सिंह के परिवार ने इस बसावट की शुरुआत की थी। कठिन परिस्थितियों में बसाए गए इस गांव ने समय के साथ अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई और आज यह क्षेत्र शिक्षा, सैन्य परंपरा तथा सामाजिक एकता के लिए मिसाल माना जाता है।
🟢 वीर चक्र और मिलिट्री क्रास से सम्मानित है यह भूमि
टिटोली गांव का इतिहास देश सेवा और शिक्षा से समृद्ध रहा है। वर्ष 1901 में ही यहां प्राथमिक विद्यालय की स्थापना हो गई थी, जिससे यह क्षेत्र के शुरुआती शिक्षा केंद्रों में शुमार हुआ। वहीं, 1916 में गोरखा राइफल्स में पहली भर्ती के साथ शुरू हुई सैन्य परंपरा आज भी कायम है।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यहां के हवलदार धन सिंह को ‘जंगी इनाम’ तथा हरक सिंह को ‘मिलिट्री क्रास’ से सम्मानित किया गया था। वहीं, स्वतंत्रता के बाद जम्मू-कश्मीर की रक्षा में अदम्य साहस का प्रदर्शन करने वाले नायब सूबेदार धन सिंह को देश के प्रतिष्ठित ‘वीर चक्र’ से नवाजा गया था।
|
टिटोली गांव: इतिहास के झरोखे से |
|
|---|---|
|
स्थापना तिथि |
24 जून 1894 |
|
प्रथम प्राथमिक विद्यालय |
वर्ष 1901 (शिक्षा का प्रारंभिक केंद्र) |
|
सैन्य परंपरा की शुरुआत |
वर्ष 1916 (गोरखा राइफल्स में पहली भर्ती) |
|
प्रमुख सैन्य सम्मान |
वीर चक्र, मिलिट्री क्रास, जंगी इनाम |
🟢 ‘मातृभूमि रक्षा समिति’ की सराहनीय पहल
समय के साथ टिटोली भी पलायन की समस्या से अछूता नहीं रहा, लेकिन गांव से बाहर रह रहे लोगों को अपनी मिट्टी से जोड़े रखने और नई पीढ़ी को इस गौरवशाली इतिहास से परिचित कराने के लिए वर्ष 2022 में ‘मातृभूमि रक्षा समिति’ का गठन किया गया। समिति ने ही हर वर्ष 24 जून को सामूहिक रूप से स्थापना दिवस मनाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया, जो आज रंग ला रहा है।
इस समारोह में देश के कोने-कोने से पहुंचे प्रवासियों ने अपने बच्चों को गांव के इतिहास और पूर्वजों के संघर्ष से रूबरू कराया। बुजुर्गों ने इस पहल को गांव की एकता को जीवित रखने के लिए संजीवनी बताया।
🟢 समारोह में जुटे प्रबुद्ध जन
इस भव्य समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में जिला सैनिक कल्याण एवं पुनर्वास अधिकारी कर्नल वेद प्रकाश जोशी (सेना मेडल) उपस्थित रहे। उनके साथ ही विशिष्ट अतिथि सहायक अभियंता मनोज पंत, जगन्नाथ चंदोला, मोहन चंद्र चंदोला और रतन सिंह नगरकोटी सहित भवान सिंह, श्याम सिंह, भगवान सिंह, उम्मेद सिंह, दीवान सिंह, आनंद सिंह और सुरेंद्र सिंह रौतेला सहित बड़ी संख्या में मातृशक्ति और ग्रामीण मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में संकल्प लिया कि वे अपनी आने वाली पीढ़ियों को मातृभूमि और उसकी समृद्ध परंपराओं से जोड़े रखेंगे।
🟢 संदेश
टिटोली गांव का यह प्रयास उत्तराखंड के अन्य पलायन प्रभावित गांवों के लिए एक मार्गदर्शक का काम कर सकता है, जो यह दिखाता है कि यदि इच्छाशक्ति हो तो अपनी जड़ों की ओर लौटना असंभव नहीं है।
