उत्तराखंड यमुनोत्री पैदल मार्ग पर व्यवस्थाएं ध्वस्त, देवदेखनी से घोड़ा पड़ाव तक लगा भीषण जाम, घंटों भारी जाम में फंसे रहे श्रद्धालु,,,,

उत्तरकाशी। उत्तराखंड में चारधाम यात्रा के शुरुआती चरण में ही श्रद्धालुओं की भारी आमद ने व्यवस्थाओं की पोल खोल दी है। बुधवार को यमुनोत्री धाम के पैदल मार्ग पर उमड़ी भारी भीड़ के कारण यात्रियों को भीषण जाम का सामना करना पड़ा। धाम के समीप देवदेखनी से घोड़ा पड़ाव के बीच संकरा रास्ता होने के कारण ‘मानव जाम’ की स्थिति बन गई, जिसमें तीर्थयात्री करीब डेढ़ घंटे तक फंसे रहे।
संकरे मार्ग और अव्यवस्था ने बढ़ाई मुश्किल

यमुनोत्री धाम का पैदल मार्ग कई स्थानों पर अत्यधिक संकरा है। स्थानीय निवासियों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जाम का मुख्य कारण मार्ग पर घोड़े-खच्चरों का अनियंत्रित खड़ा होना और डंडी-कंडी मजदूरों द्वारा रास्ते में ही अपनी डंडियां रखना है। बुधवार दोपहर करीब 3:30 बजे शुरू हुआ यह जाम शाम तक जारी रहा, जिसे स्थानीय लोगों और पुलिस के हस्तक्षेप के बाद बड़ी मुश्किल से खुलवाया जा सका।
प्रतिदिन पहुंच रहे 10 हजार से अधिक श्रद्धालु

मई माह की शुरुआत के साथ ही यमुनोत्री धाम में श्रद्धालुओं का आंकड़ा प्रतिदिन 10 हजार के पार जा रहा है। बढ़ती भीड़ के अनुपात में पैदल मार्ग की चौड़ाई और सुरक्षा इंतजाम नाकाफी साबित हो रहे हैं। विशेष रूप से जानकीचट्टी से यमुनोत्री के बीच के संवेदनशील मोड़ों पर यात्रियों का दबाव बढ़ते ही आवाजाही ठप हो जा रही है।
प्रशासनिक दूरदर्शिता का अभाव

हैरानी की बात यह है कि यह समस्या हर वर्ष इसी स्थान पर उत्पन्न होती है, फिर भी प्रशासन और पुलिस की ओर से अब तक भीड़ नियंत्रण (Crowd Management) की कोई ठोस योजना तैयार नहीं की गई है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि:
- संकरे रास्तों पर घोड़े-खच्चरों और पैदल यात्रियों के लिए अलग-अलग समय या लेन का निर्धारण नहीं है।
- डंडी-कंडी रखने के लिए मार्ग से हटकर कोई निश्चित स्थान तय नहीं किया गया है।
- भारी भीड़ के बावजूद संवेदनशील पॉइंट्स पर पुलिस बल की कमी देखी जा रही है।
यात्रियों की सुरक्षा पर सवाल
खड़ी पहाड़ी और संकरे रास्तों पर इस तरह का जाम न केवल यात्रियों की थकान बढ़ाता है, बल्कि किसी बड़ी दुर्घटना या भगदड़ की स्थिति में जानलेवा भी साबित हो सकता है। श्रद्धालुओं ने मांग की है कि यात्रा के सुचारू संचालन के लिए प्रशासन को तुरंत सख्त कदम उठाने चाहिए और डंडी-कंडी व घोड़ा-खच्चर संचालकों के लिए कड़े नियम लागू करने चाहिए।
