उत्तराखंड, भूकंप की सटीक भविष्यवाणी तो मुमकिन नहीं, पर ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ से बहेगी जिंदगियों की ढाल, उत्तराखंड का ‘भूदेव’ ऐप बना मिसाल,,,

नई दिल्ली: दुनिया के अन्य विकसित देशों की तरह भारत के पास भी अभी तक भूकंप आने से पहले उसकी सटीक भविष्यवाणी करने वाली कोई वैज्ञानिक तकनीक उपलब्ध नहीं है। हालांकि, देश ने इस चुनौती का सामना करने के लिए एक मजबूत विकल्प तैयार कर लिया है। भारत ने हिमालयी क्षेत्र में एक ऐसा आधुनिक भूकंपीय निगरानी नेटवर्क और क्षेत्रीय भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली (EEW) विकसित की है, जो भूकंप के शुरू होते ही और खतरनाक झटके पहुंचने से कुछ सेकंड पहले लोगों को अलर्ट कर सकती है।
🟢 आईआईटी रुड़की और उत्तराखंड सरकार की बड़ी कामयाबी: ‘भूदेव’ ऐप
इस अर्ली वार्निंग सिस्टम को और अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में सबसे सफल और व्यावहारिक प्रयास आईआईटी रुड़की ने उत्तराखंड सरकार के साथ मिलकर किया है। दोनों के संयुक्त प्रयासों से ‘भूदेव’ नाम का एक अत्याधुनिक भूकंप पूर्व चेतावनी ऐप विकसित किया गया है। यह ऐप आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर भूकंप के खतरों से निपटने और स्थानीय लोगों की सुरक्षा व लचीलापन सुनिश्चित करने में मील का पत्थर साबित हो रहा है।
🟢 हिमालयी क्षेत्रों में रियल-टाइम मॉनिटरिंग और एडवांस एल्गोरिदम
सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, पूरे हिमालयी क्षेत्र में अर्ली वार्निंग सिस्टम को समर्पित एक ‘रियल-टाइम भूकंपीय नेटवर्क’ शुरू किया जा चुका है। इसके साथ ही, नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी (NCS) क्षेत्रीय डेटा का उपयोग करके प्रोटोटाइप ईईडब्ल्यू एल्गोरिदम को विकसित और टेस्ट कर रहा है।
इसके जरिए:
- प्राथमिक तरंगों (P-Waves) की सटीक पहचान की जा सकेगी।
- भूकंप की तीव्रता का तेजी से अनुमान लगाया जा सकेगा।
- मुख्य झटके (S-Waves) आने से पहले की सटीक भविष्यवाणी संभव होगी।
🟢 कैसे काम करता है यह अर्ली वार्निंग सिस्टम?
भूकंप आने पर मुख्य रूप से दो तरह की तरंगें निकलती हैं। इसमें से पी-वेव्स (Primary Waves) सबसे तेजी से यात्रा करती हैं और इनसे आमतौर पर नुकसान नहीं होता है।
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- डिटेक्शन: ईईडब्ल्यू सिस्टम भूकंप के केंद्र (एपिसेंटर) के पास लगे सेंसर्स के जरिए इन शुरुआती पी-वेव्स को तुरंत पकड़ लेता है।
- अलर्ट ट्रांसमिशन: विनाशकारी तरंगों (Secondary Waves) के पहुंचने से पहले ही यह सिस्टम दूर स्थित रिहायशी इलाकों में डिजिटल अलर्ट भेज देता है।
- कीमती सेकंड्स की बचत: इस तकनीक से प्रशासन और आम जनता को सायरन बजाने, बिजली-गैस सप्लाई बंद करने या सुरक्षित स्थानों पर पहुंचने के लिए कुछ बेहद कीमती सेकंड मिल जाते हैं।
🟢 दूरी पर निर्भर करता है समय
इस सिस्टम से मिलने वाला चेतावनी का समय पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि कोई शहर भूकंप के केंद्र से कितना दूर है। केंद्र के बिल्कुल करीब होने पर चेतावनी का समय न के बराबर मिलेगा, जबकि सैकड़ों किलोमीटर दूर होने पर बचाव के लिए अतिरिक्त और बेहद अहम सेकंड मिल सकते हैं।
🟢 उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊं में बिछा सेंसर्स का जाल
भारत में इस सेंसर नेटवर्क को मुख्य रूप से उत्तराखंड के बेहद संवेदनशील गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्रों में स्थापित किया गया है। इन सेंसर्स को जानबूझकर सक्रिय फॉल्ट जोन (Active Fault Zones) के बेहद करीब लगाया गया है, ताकि हलचल होते ही तेज झटके आने से पहले आसपास के शहरों को अलर्ट भेजा जा सके।
वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो वर्तमान में भारत के अलावा जापान, ताइवान और अमेरिका के पास दुनिया की सबसे उन्नत भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणालियां मौजूद हैं।
