रक्षाबंधन का पावन पर्व, भाई-बहन के अटूट स्नेह और रक्षा के संकल्प का प्रतीक, भद्रा का छह पूरे दिन मनाया जाएगा त्यौहार,,,

देहरादून। श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला रक्षाबंधन भाई-बहन के बीच प्रेम, अटूट विश्वास और रक्षा के संकल्प का सबसे पवित्र त्योहार है। इस साल भद्रा काल का साया न होने के कारण रक्षाबंधन पर पूरे दिन राखी बांधी जा सकती है।
राखी बांधने का सबसे पहला शुभ मुहूर्त सुबह 5 बजकर 57 मिनट से लेकर सुबह 9 बजकर 48 मिनट तक है, इसके अलावा दोपहर में अभिजीत मुहूर्त (सुबह 11:56 बजे से दोपहर 12:48 बजे तक) में भी राखी बांधी जा सकेगी। यह पर्व महज एक कच्चे सूत का बंधन नहीं है, बल्कि पारिवारिक और सांस्कृतिक मूल्यों का एक अनूठा प्रतीक है।
🏵️ महाभारत और पुराणों से जुड़ी प्रमुख कथाएं
इस पावन पर्व का इतिहास और महत्व पौराणिक कथाओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। महाभारत काल की एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब भगवान कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया था, तब उनकी उंगली कट गई थी। उस संकट की घड़ी में द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था। भगवान कृष्ण ने इसे रक्षासूत्र मानते हुए भविष्य में हर संकट से द्रौपदी की रक्षा करने का वचन दिया था, जिसे उन्होंने चीरहरण के समय निभाया।
🏵️ माता लक्ष्मी, देवराज इंद्र और यम-यमुना की पौराणिक मान्यताएं

इसी तरह, भविष्य पुराण में माता लक्ष्मी और राजा बलि की कथा का वर्णन मिलता है, जिसके अनुसार माता लक्ष्मी ने राजा बलि को भाई बनाकर उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बांधा था। इसके अलावा, देवराज इंद्र और इंद्राणी (शची) की कथा भी काफी प्रचलित है, जहां युद्ध में देवताओं की विजय के लिए इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर अभिमंत्रित रक्षासूत्र बांधा था। वहीं, मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना से जुड़ी कथा के अनुसार, सावन पूर्णिमा पर यमुना द्वारा राखी बांधने से प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें अमरता का वरदान दिया था और यह मान्यता स्थापित की कि इस दिन भाई को राखी बांधने वाली बहनों के भाई दीर्घायु होते हैं।
🏵️ पारिवारिक महत्व और श्रावणी पर्व की परंपरा
रक्षाबंधन के इस विशेष दिन पर बहनें अपने भाइयों के माथे पर तिलक लगाकर आरती उतारती हैं और उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं, जबकि भाई उनकी हर परिस्थिति में रक्षा करने का संकल्प लेते हैं। सामाजिक और पारिवारिक दृष्टिकोण से यह त्योहार आपसी रिश्तों को मजबूत करने का कार्य करता है। इसके साथ ही, इस दिन को ‘श्रावणी पर्व’ के रूप में भी मनाया जाता है, जिसमें वेदों के अध्ययन, प्रायश्चित और ऋषि तर्पण की प्राचीन परंपराओं को निभाने का भी विधान है।
