“आरक्षण” केवल 1 अंक वाले छात्र को मिली MS ऑर्थोपेडिक्स की सीट, आरक्षण के दायरे और कम कट-ऑफ के बीच मेडिकल काउंसलिंग पर खड़े हुए गंभीर सवाल,,,,,

हैदराबाद: तेलंगाना में नीट-पीजी (NEET-PG) काउंसलिंग के दौरान सामने आए एक हैरान करने वाले मामले ने आरक्षण व्यवस्था, मेरिट के मानदंडों और चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर एक बड़ी बहस छेड़ दी है। इस मामले में मात्र 1 अंक हासिल करने वाले और 2,29,981 की ऑल इंडिया रैंक वाले एक छात्र को हैदराबाद के एक प्रतिष्ठित प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में एमएस ऑर्थोपेडिक्स (सर्जरी) जैसी संवेदनशील और महत्वपूर्ण शाखा में सीट मिल गई है।
🔴 आरक्षण और कट-ऑफ के परिप्रेक्ष्य में मुख्य बिंदु
इस प्रकार के दाखिले मुख्य रूप से निम्नलिखित परिस्थितियों और प्रशासनिक नियमों के तहत संभव होते हैं:
- कट-ऑफ में भारी गिरावट: विभिन्न श्रेणियों के लिए निर्धारित सीटों को भरने हेतु जब योग्य उम्मीदवारों की कमी होती है, तो केंद्र सरकार और चिकित्सा प्राधिकरणों द्वारा कट-ऑफ स्कोर को काफी हद तक कम कर दिया जाता है, जिससे न्यूनतम या नकारात्मक अंकों वाले छात्रों के लिए भी रास्ते खुल जाते हैं।
- आरक्षित सीटों और खाली सीटों का समीकरण: काउंसलिंग के तीसरे दौर (Third Round) तक कई क्लीनिकल और सर्जिकल शाखाओं की सीटें रिक्त रह जाती हैं। नियमों के अनुसार, विभिन्न आरक्षित श्रेणियों (जैसे एससी, एसटी या ओबीसी) के तय चरणों के बाद भी यदि सीटें खाली रहती हैं, तो पात्रता का दायरा नीचे खिसकता जाता है।
- निजी कॉलेजों के नियम व श्रेणियां: यह आवंटन हैदराबाद के एक निजी मेडिकल कॉलेज में हुआ है, जहां की फीस अत्यधिक अधिक होती है। ऐसे संस्थानों में आरक्षित श्रेणियों के प्रावधानों और खाली बची सीटों के समायोजन के नियमों के तहत कम अंक वाले उम्मीदवार भी प्रवेश पा लेते हैं।
🔴 क्या यह आमजन की जान के साथ खिलवाड़ है?
चिकित्सा विशेषज्ञों और आम जनता का यह तर्क पूरी तरह से तार्किक है कि सर्जरी जैसी सर्जिकल विधाओं में इस तरह के प्रवेश मानकों से समझौता करना जोखिम भरा हो सकता है:
- ज्ञान का अभाव: जो छात्र प्रवेश परीक्षा में बुनियादी अंक (यहाँ तक कि 1 अंक) भी प्राप्त नहीं कर पाया, उससे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह अस्पताल के आपातकालीन कक्ष (Emergency Ward) में आने वाले गंभीर मरीजों का सही इलाज कर पाएगा।
- कमजोर व्यावहारिक दक्षता: पीजी (Post-Graduation) का मतलब ही विशेषज्ञता हासिल करना है। यदि छात्र का बेसिक मेडिकल ज्ञान ही बेहद कमजोर होगा, तो वह सीनियर डॉक्टरों के मार्गदर्शन में भी जटिल ऑपरेशन करने में असहज महसूस करेगा।
🔴 मेडिकल समुदाय और विशेषज्ञों की चिंता
इस घटना के सामने आने के बाद देश भर के डॉक्टरों और चिकित्सा विशेषज्ञों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है:
- योग्यता बनाम आरक्षण और मेरिट: विशेषज्ञों का कहना है कि जहां एक ओर आरक्षण प्रणाली का उद्देश्य सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है, वहीं दूसरी ओर ऑर्थोपेडिक्स जैसी हाई-रिस्क सर्जिकल विधाओं में इतने न्यूनतम स्कोर पर प्रवेश मिलने से मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और निष्पक्ष मेरिट पर सवाल उठने लगते हैं।
- मरीजों की सुरक्षा: जानकारों का मानना है कि जो छात्र प्रवेश परीक्षा में बुनियादी अंक भी प्राप्त नहीं कर सके, उन्हें सर्जरी जैसी गंभीर जिम्मेदारी सौंपना मरीजों की जान के साथ जोखिम पैदा कर सकता है।
फिलहाल, यह मामला इस बात पर एक राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है कि क्या आरक्षित और खाली सीटों को भरने के लिए कट-ऑफ अंकों में इतनी ढील दी जानी चाहिए, जिससे चिकित्सा शिक्षा के स्तर और पेशेवर दक्षता पर असर पड़े।
